इतिहास | Shri Krishna Gaushala
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इतिहास

श्री कृष्ण गौशाला सुलतानपुर डबास का 15 अगस्त 1995 को जन्माष्टमी के दिन तत्कालीन विकास मंत्री (दिल्ली सरकार) श्री साहिब सिंह वर्मा के हाथों हुआ था। इस गौशाला में शुरू में 15 गौवंश थे। दिल्ली सरकार द्वारा प्रदत्त 177 बीघा भूमि पर यह गौशाला स्थापित हुआ था। इस गौशाला का संचालन करने के लिए एक संचालन समिति स्व. सूरजभान गुप्ता(केवल पार्क) के अध्यक्षता में बनाई गयी थी। समिति के सामने गउओं के पीने का पानी की समस्या सबसे जटिल थी। जिसे मंत्री छगनलाल गुप्ता ने अथक प्रयास कर श्री साहिब सिंह वर्मा का सहयोग लेकर हरियाणा के नहर से 4 इंच का मोड़ी मंजूर कराकर का समाधान किया। समिति गौशाला के लिए धन संग्रह करता है और गौमाता के लिए तुड़े आदि की व्यवस्था करता है। धन संग्रह कर शेडों का निर्माण कार्य शुरू किया, धीरे धीरे नए शेड बनते गए।

देश के अनेक महापुरुष जैसे संत ज्ञानानंद जी महाराज, स्वामी रामदेव जी, साध्वी ऋतम्भरा जी, संत शरणानन्द जी महाराज आदि समय समय पर आकर मार्ग दर्शन करते रहे। 2006 तक गौशाला में 15 शेड और 3 तुड़े के गोदाम बन गए थे। 2006 के बाद गौशाला तेजी से प्रगति के मार्ग पर चल पड़ा। श्री अग्रवाल के नेतृत्व में आधुनिकरण की प्रक्रिया प्रारम्भ हुयी। तूड़ा का एक बहुत बड़ा गोदाम, जिसमे लगभग 25 हजार क्विंटल तूड़ा रखा जाता है का निर्माण शुरू हुआ।

नए पैटर्न का शेड बंनाने का कार्यक्रम बना और बड़े हुए गोवंश के दृष्टि से एक बड़ा पीने के पानी का तालाब बनाने की योजना पर कार्य प्रारम्भ हुआ। सम्पूर्ण भूमि की चहारदीवारी बनवाई गयी और बाद में उस पर कटीले तार लगवाये गए ताकि कुत्ते गौशाला में ना आ सकें। गौशाला में अपना धर्मकांटा है। और यहाँ लगे बायोगैस प्लांट पर सभी सेवकों का खाना बनता है।धीरे-धीरे गौशाला प्रगति करता गया और अब गौशाला में लगभग 7000 गौमाता के शरण देने के लिए 35 छायादार शेड 40 ओपेन शेड हैं। एक शानदार पार्क, यज्ञ मंडप, सभास्थल, 45 हजार क्विंटल तूड़ा रखने के गोदाम, 5 स्टोर रूम, अतिथि भवन, 3 कार्यालय भवन, भोजनालय आदि सभी कुछ पूर्ण विकसित व्यवस्था में चल रहे है ।

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